झारखंड आंदोलन : गवाही इतिहास की
प्राकृतिक संपदा में देश का सबसे धनी राज्य झारखंड आज वास्तविक तौर पर सबसे गरीब है। यहां के लोग आज भी जैसे आदिम युग से निकलने के लिये कसमसा रहे हैं। ये वह लोग हैं जो वास्तव में झारखंड के बाशिंदें हैं, न कि पूंजीवादी तिकडमों के तहत इस राज्य में घुसपैठ करनेवाले बाहरी। ये बाहरी तो धन-धान्य से परिपूर्ण हैं। हालात के लिये जिम्मेवार कौन? यह सवाल अक्सर पूछा जाता है। लेकिन, जवाब जिनके पास है उनके पास शब्द नहीं, शिक्षा और जागरूकता नहीं। वे आज भी जंगल के आसरे हैं। जबकि, इतिहास गवाह है कि हर हमलावर लोभी शासक इस इलाके को सोने की खान समझता आया। बस, यहां के लोगों को छोड कर। सदियों बाद अलग राज्य मिला भी तो किस्मत दगा दिये जा रही है। नेता अपने हैं, लेकिन उनकी नीयत में वह अपनापन लुप्त है। देखते हैं क्या कहता है इस प्रदेश का इतिहास।
इतिहास की गहराई में जाने पर पता चलता है कि झारखंड अलग राज्य की कसमसाहट मुगलों के भारत आगमन पर ही शुरू गयी थी। मुगलों ने 1385 में इस वन प्रदेश के आदिवासी आबादी पर चढाई की थी। नागवंशी राजा दुर्जन शाल को 1616 में गिरफ्तार कर बारह साल तक बंदी रखा गया। उस दौरान मराठों ने भी आक्रमण किया था। लेकिन, अंग्रेजो के लंबे अरसे के शोषण जनमानस आक्रांत हुई। यहां के पडहा-परगनइत 1769 से 93 तक अंग्रेजों के दमन को किसी तरह सहते रहे। बरदास्त की हदें पार होने लगी तो मालगुजारी वसूली की खिलाफत में अंग्रेजों और उनके एजेंटों पर कबीलाई हमले शुरू हुए। उस दौरान, 1793 में तिलका मांझी का संथाल विद्रोह, 1798 में भूमिज विद्रोह, 1810 में चेरो विद्रोह, 1819 में मुंडा विद्रोह, 1834 में चांदभैरव और बुद्धू भगत का सिपाही विद्रोह, 1875 में सरदार आंदोलन एवं 1895 और 1914 में जतरा भगत का टाना भगत आंदोलन चलता रहा। 1915-38 तक उन्नति समाज का सुधारवादी आंदोलन बौद्धिक क्रांति का काल था।
1938 में जयपाल सिंह के उदय और आदिवासी महासभा का गठन झारखंड आंदोलन का मजबूत पडाव बना था। 1946 में राजनीतिक स्वरूप की शुरूआत हुई प्रोविजनल सरकार के लिये चुनाव प्रक्रिया में हिस्सेदारी से। 1950 में आदिवासी महासभा का पुनर्गठन झारखंड पार्टी के रूप में हुआ। 1952 में, स्वतंत्र भारत के प्रथम आम चुनाव में बिहार से 32 सीट जीतकर यह पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी। अलग झारखंड के लिये प्रदर्शन के सिलसिले की शुरूआत 1955 में राज्य पुनर्गठन आयोग के आगमन पर हुई। 1957 के चुनाव में फिर झारखंड पार्टी प्रमुख विपक्षी दल के रूप में उभरी। लेकिन, 1962 के आम चुनाव में पार्टी का ह्त्रास हुआ। विधानसभा में सीट घटकर 20 रह गई। और 1963 में झारखंड पार्टी को कांग्रेस में विलय हो जाना पडा। इस दौरान अखिल भारतीय झारखंड और हूल झारखंड दलों का क्षीण प्रभाव भी रहा। 1968 में गठित झारखंड दल भी निष्प्रभावी रहा। इसी दौरान जयपाल सिंह का अस्तकाल भी कहा जाता है। एन ई होरो भी उभरे लेकिन पार्टी विभाजन ने उन्हें भी नहीं बख्शा।
1970 में शिबु सोरेन ने सोनत संथाल समाज का गठन कर सुधारवादी आंदोलन की शुरूआत की। मुख्य उद्देश्य था नशा, साहूकारी और जमीन कब्जाइयों की खिलाफत। अगल राज्य की मांग एक बार फिर 1971 में ए के राय की माक्र्सवादी समन्वय समिति ने शुरू की। इसी वर्ष बिहार सरकार द्वारा छोटानागपुर संथालपरगना स्वशासी विकास का गठन किया गया जो निष्फल साबित हुआ। 1972 में झारखंड पार्टी टूटी और बागुन सुंब्रई एवं एन ई होरो दो गुटों में अलग हो गये।
झारखंड आंदोलन ने एक बार फिर करवट लिया और ए के राय, विनोद बिहारी महता एवं शिबु सोरेन ने मिलकर 1973 में झारखंड मुक्ति मोरचा का गठन किया। आंदोलन तेज हो गया। श्रृंखलाबद्ध घटनाएं प्रस्तुत हैंः
1977 - रांची में शाखा सचिवालय की स्थापना
1978 - सिंहभूम में जंगल आंदोलन
1978 (21 मई) - ऑल इंडिया झारखंड पार्टी का सम्मेलन, 15 अगस्त तक अलग राज्य का अल्टीमेटम, सीपीआई समर्थन में आयी।
1978 (9 जून, बिरसा दिवस) - जेल भरो आंदोलन, सरकारी संपत्ति की तोडफोड, पुलिस की गोली से आंदोलनकारियों की मौत, बंद बुलाने की राजनीतिक की शुरूआत। ेंद्र सरकार की चंद्रमोहन जांच कमिटी ने जांच की और जमीन कब्जाइयों के खिलाफ कार्रवाई के लिये कहा जो बेनतीजा निकला।
1980 - मध्यावधि चुनाव में शिबु सोरेन के झामुमो को बडी सफलता। बागुन सुंब्रई कांग्रेस में शामिल।
1980-90 - क्षेत्रीय एवं जनजातीय भाषा विभाग की स्थापना।
1981 - कोल्हान रक्षा संघ के अध्यक्ष नारायण जोंको तथा सचिव के सी हेम्ब्रम ने लंदन में कॉमन वेल्थ से अलग कोल्हान राज्य की गुहार लगायी।
1984 - विनोद बिहारी महतो की जगह निर्मल महतो झामुमो के अध्यक्ष बनाये गये।
1986 (22जून) - ऑल झारखंड स्टूडेन्ट्स यूनियन (आजसू) का गठन।
1987 (08अगस्त) - निर्मल महतो की हत्या। झामुमो से आजसू अलग हो गया।
1987 (सितंबर) - झारखंड समन्वय समिति का गठन।
1989 (23 अगस्त) - ेंद्र सरकार द्वारा झारखंड विषयक समिति का गठन। समिति में शिबु सोरेन, रामदयाल मुंडा, बीपी केशरी, अमर कुमार सिंह, एन ई होरो, विनोद बिहारी महतो, सूर्य सिंह बेसरा, प्रभाकर तिर्की, सूरज मंडल, शैलेंद्र महतो, स्टीफन मरांडी, आदि सदस्य बनाये गये।
1989 (4 सितंबर) - झारखंड विषयक समिति की पहली बैठक। बाद में तयशुदा तारीखों को समिति के सदस्यों ने दुमका, रांची, मध्यप्रदेश, बंगाल और उडीसा का दौरा किया। 31 जनवरी को कलकळाा में हजारों की रैली की।
1989 (1 मार्च) - आर्थिक नाके बंदी की घोषणा
1989 (20-22 अप्रैल तक) - 72 घंटे का सफल झारखंड बंद।
1989 (14 मई) - झामुमो के दो विधायकों को छोड सभी विधायकों ने बिहार विधानसभा से त्यागपत्र दिया।
1989 (7 जून) - गृहमंत्री बूटा सिंह की अध्यक्षता में दिल्ली में बैठक, हिस्सा लिया बिहार के मुख्यमंत्री सत्येंद्र नारायण सिंह, रामदयाल मुंडा, एनई होरो, विनोद बिहारी महतो, बीपी केशरी, सूर्य सिंह बेसरा आदि मौजूद थे लेकिन शिबु सोरेन की पार्टी ने विरोध करते हुए बैठक का बहिष्कार किया।
1990 (5 जनवरी) - आजसू का तीसरो महाधिवेश, मुंडा द्वारा उद्घाटन।
1990 (24 मार्च) - आजसू का छह सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद से मिला।
1990 (18 मई) - झारखंड विषयक समिति ने ेंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट सौंपी।
1991 (18 मई) - झारखंड विकास परिषद विधेयक को बिहार विधानसभा की मंजूरी मिली।
1992 (20 मार्च) - झारखंड विषयक समिति की रिपोर्ट संसद में पेश।
1993 (5 मार्च) - झारखंडी नेता प्रधानमंत्री से मिले।
1993 (11 मार्च) - सर्वदलीय झारखंड संघर्ष समिति ने संकल्प लिया - अलग राज्य से कुछ भी कम नहीं चाहिए।
1995 (7 अगस्त) - झारखंड क्षेत्र स्वशाषी परिषद के गठन की राजकीय अधिसूचना जारी।
1995 (9 अगस्त) - अंतरिम झारखंड क्षेत्र स्वशाषी परिषद (जैक) और अंतरिम कार्यकारी परिषद अस्तित्व में आयी। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को शपथ दिलायी गयी।
1997 (4 जुलाई) - बिहार सरकार ने जैक को पूर्ण अधिकार देने की घोषणा की।
1997 (22 जुलाई) - बिहार विधानमंडल में अलग राज्य का प्रस्ताव पारित।
1998-99 - इस दौरान झारखंड वनांचल बिल नामंजूर करने की कोशिश भी विधानसभा में हुई।
2000 (2 अगस्त) - ेंद्र सरकार ने लोकसभा में बिहार राज्य पुनर्गठन विधेयक पास कर दिया।
2000 (11 अगस्त) - राज्य पुनर्गठन विधेयक को राज्य सभा की स्वीकृति मिली।
2000 (25 अगस्त) - राज्य पुनर्गठन विधेयक को राष्ट्रपति की स्वीकृति मिल गयी।
2000 (1 नवंबर) - झारखंड राज्य के गठन की घोषणा हो गयी।
2000 (14-15 नवंबर, आधी रात) - देश के भूगोल में 28 राज्य के रूप में झारखंड का अभ्युदय हुआ।
